ग्यारह दिन के जन आंदोलन का नतीजा बेअसर, केन बेतवा नदी गठजोड़ से प्रभावित उजाड़ होते जंगल मे चिता पर.....
आदिवासियों की यह लड़ाई अब पन्ना टाइगर रिजर्व के 43 लाख पेड़ो के कटान से मुआवजा और विस्थापित होने के बाद पुनर्वास तक सिमट चुकी है...
"यूपी,एमपी बुंदेलखंड को सिंचाई के दृष्टिकोण से समृद्ध करने का सब्जबाग दिखाकर पहले यूपीए सरकार ने इस केन बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना का खाका तैयार किया था। साल 2005 में यूपी के सीएम मुलायम सिंह और मध्यप्रदेश के सीएम बाबूलाल सिंह गौर के बीच मसौदा हस्ताक्षर किए गए। तब से आज तक यह परियोजना लगातार विवादों में है। आदिवासियों की यह लड़ाई अब पन्ना टाइगर रिजर्व के 43 लाख पेड़ो के कटान से मुआवजा और विस्थापित होने के बाद पुनर्वास तक सिमट चुकी है। बावजूद इसके पिछले डेढ़ दशक से उनका संघर्ष और अब लगातार 11 दिन से चिता आंदोलन, मिट्टी आंदोलन, जल सत्याग्रह और प्रशासन के साथ संवाद की प्रक्रिया सराहनीय है।"
बांदा/,छतरपुर। मध्यप्रदेश के जिला छतरपुर की तहसील बिजावर और पन्ना टाइगर रिजर्व के कुल दस गांव सीधे तौर पर इस बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में आते है। वहीं लगभग 20 गांवों को खेती,आवास, आजीविका के संकट से जूझना पड़ेगा। केंद्र सरकार और विश्व बैंक के सहयोग से जमीन पर उतर रही इस केन बेतवा लिंक बांध परियोजना का उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र के कम पानी की उपलब्धता वाले पन्ना, छतरपुर, महोबा, ललितपुर, झांसी और बांदा को सिंचाई के संसाधनों से लबरेज करना है। वहीं प्रस्तावित बजट 44 हजार 605 करोड़ की इस बांध परियोजना के जद मे आ रहे आदिवासियों और किसानों के विस्थापन वाले गांवों को सरकार 5 लाख रुपए प्रति परिवार मुआवजा देने की बात राज्य सरकार कर रही है। इस बांध परियोजना से 10 लाख हेक्टेयर की खेतिहर भूमि को सिंचाई और 62 लोगों को पेयजल संसाधन देना सरकार के दावों में शामिल है। सरकार ने फारेस्ट एडवाइजरी कमेटी (FAC) की एजेंडा रिपोर्ट दिनांक 16 मई 2017 को दरकिनार करते हुए इस बांध परियोजना से 103 मेगावाट विद्युत पावर प्लांट बिजली उत्पादन को नहीं हटाया है। इसको भी धरातल पर उतारने की मंशा है। जबकि पर्यावरण संरक्षण के बुनियादी सिद्धांत अनुसार फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी ने इसको वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के मद्देनजर घातक स्वीकार किया है। बड़ी बात है कि इस बांध परियोजना में पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र की 6 हजार हेक्टेयर से ज्यादा वनभूमि अधिग्रहण की गई है। जिसके और ज़्यादा बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।
चार पीढ़ियों से बसे गांवों का आंदोलन
केन बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना के जमीन पर मुकम्मल होने के अच्छे दिन देखने के बीच विस्थापित गांवों के किसानों और आदिवासियों ने इस प्रोजेक्ट्स के प्रतिरोध पर लंबे अर्से से जुड़े बिजावर के सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में पिछले 11 दिनों से पन्ना टाइगर रिजर्व के गंगऊ बांध क्षेत्र एवं विस्थापित गांव सुकवाहा के बीच आंदोलन छेड़ रखा है।
इस आंदोलन के पूर्व भी अमित भटनागर को एसडीएम बिजावर ने सत्याग्रह करने पर गिरफ्तार किया था। लगभग पांच साल से लगातार ज्ञापन,निवेदन,अनशन, पदयात्रा, भूख हड़ताल और दिल्ली जाने की कवायद में आदिवासियों, प्रभावित किसानों की मांगो को अनदेखा किया गया है। हालात यह है कि संवेदनशील ईको सेंसेटिव जोन में बांध की निर्माण सामग्री मसलन स्टोन, गिट्टी के लिए एक क्रेशर भी स्थापित किया गया है। यह वो इलाका है जहां अंग्रेजों ने भी वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम 1986 की प्रासंगिकता पर सड़के और कंक्रीट के जंगल खड़े नहीं किए थे। वहीं वन अधिकार अधिनियम 2006 का भी उल्लंघन यहां किया जा रहा है।
आदिवासियों का आरोप है कि उनके पुनर्वास, मुआवजा के लिए जनसुनवाई और ग्राम सभा की बैठक गोपनीय तरीके से की गई है। विस्थापित लोगों के सर्वेक्षण का दस्तावेज सार्वजनिक नहीं है कि उन्हें कितना मुआवजा मिलना है और दिया जाएगा। अमित भटनागर के नेतृत्व में हजारों किसान, युवा एकजुट होकर केन नदी के तीरे पन्ना टाइगर में प्रतिरोध की आवाज को नया स्वर दे रहें है। उधर एसडीएम बिजावर, पन्ना जिला कलेक्टर, छतरपुर कलेक्टर ने संवाद के लिए आंदोलन स्थल का दौरा किया है। इलाके में धारा 143 लगी है। बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित है। अमित भटनागर पर वन अधिकार कानून के तहत केस लिखा गया है। वहीं बीते बुधवार को सांकेतिक फांसी पर सत्याग्रह कर रहे आंदोलनकारी आरोप लगाए कि उनके बच्चों का राशन पानी तक प्रशासन ने बंद कर दिया है। चिकित्सा टीम धरना तक नहीं जा पा रही है।
केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट में महत्वपूर्ण पहलू
इस सिंचाई परियोजना के केंद्र सरकार द्वारा बुंदेलखंड क्षेत्र में लागू होने के पहले और बीच में कुछ महत्वपूर्ण पहलू है। जिन्हें पूरी तरह नजरंदाज किया गया है। जिसमें LARR act 2013, PESA act 1996, Forest RIghts act 2006, Enviornment Proctection act 1986, Wildlife Protection 1972 , भारतीय संविधान अनुच्छेद 14,1921 का अनुपालन न होना बताया जा रहा है । वहीं सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी (सीईसी) की रिपोर्ट एवं बांध परियोजना को मिली पर्यावरण अनापत्ति प्रमाण पत्र की आख्या मुताबिक प्रोजेक्ट्स से बिना पावर प्लांट (विद्युत परियोजना) हटाए ही उसको हूबहू क्रियान्वित करना। पन्ना टाइगर रिजर्व बफर जोन का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न होगा। साथ ही 58 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र डूबने की आशंका है। सीईसी की रिपोर्ट मुताबिक बांध परियोजना में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन और पर्यावरण के संरक्षण के बेसिक सिद्धांत की अनदेखी भारी पड़ेगी।
भारी विडम्बना है कि फारेस्ट एडवाइजरी कमेटी (FAC) की एजेंडा रिपोर्ट दिनांक 16 मई 2017 की डिटेल 119 पेजों की आख्या को नजरंदाज किया जा रहा है। जिसमें बांध परियोजना से पावर प्लांट को हटाने की बात लिखी गई थी। जो पन्ना टाइगर रिजर्व की जैवविविधता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। साथ ही पन्ना टाइगर रिजर्व के 23 से 40 लाख पेड़ो को काटा जाना है। आदिवासियों की आजीविका और ईंधन के साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान भी इन जंगलों से जुड़ी है। उनके अस्तित्व पर प्रहार इस बांध परियोजना का बड़ा स्याह परिदृश्य है। मजेदार है कि विपक्ष की पार्टी कांग्रेस और सत्ताधारी बीजेपी दोनों के नेताओं ने मौन साध रखा है। देखना होगा कि बुधवार को अमित भटनागर और छतरपुर प्रशासन के आपसी संवाद का नतीजा जंगलों की रक्षा करेगा । अथवा मुआवजे और पुनर्वास की सतही शर्तों पर पटाक्षेप होते दिखेगा।