विकास ने जनता का अनशन स्थल, सत्याग्रह और आंदोलन का साक्षी अशोक लाट चबूतरा....
जिले में शहर के चहुंमुखी विकास की अवधारणा में सड़कों के चौड़ीकरण की प्रगति लगातार तेजी से चल रही है। इस आधुनिक विकास की रफ्तार ने शहर के अलग, अलग स्थानों पर सड़क चौड़ीकरण...
"अशोक लाट स्मारक स्थल का शिलान्यास लगे हुए पत्थर मुताबिक 17 जनवरी 1948 को पंडित गोबिंद बल्लभ पंत ने किया था। बीते 57 साल पहले तत्कालीन एसपी आगा मुईनुद्दीन शाह ने 111 आंदोलन कारियों भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर गोली चलवा दी थी। जिले की आम जनता और व्यवस्था से पीड़ितों का यह अनशन स्थल रहा है।"
बांदा। जिले में शहर के चहुंमुखी विकास की अवधारणा में सड़कों के चौड़ीकरण की प्रगति लगातार तेजी से चल रही है। इस आधुनिक विकास की रफ्तार ने शहर के अलग, अलग स्थानों पर सड़क चौड़ीकरण में आबादी वाले घरों का ध्वस्तीकरण किया। भले ही वो बीडीए से नक्शा पास घर क्यों न रहें हो। मसलन जीआईसी स्कूल मार्ग पर डाक्टर एमसी पाल, सागर फोटो कापी से लेकर सड़क के दोनों तरफ हुआ विकास। या फिर संकट मोचन मार्ग से जेल रोड, क्योटरा,केन पथ मार्ग का सड़क चौड़ीकरण। सड़को और चौराहों के सुंदरीकरण में कुछ स्थान ऐसे भी है जो अपने अतीत और इतिहास को समेटे हुए आम जनता की मांगो का लोकतांत्रिक अनशन एवं सत्याग्रह स्थल रहें है। इन्हीं में से एक रहा है अशोक लाट तिराहे का वह चबूतरा,रेलिंगनुमा पार्क जहां स्थापित है अशोक लाट तिराहा। गौरतलब है कि इस अशोक लाट तिराहे में भी विकास की नजर पड़ चुकी है। जनता का आक्रोश थमा रहे इसलिए अशोक लाट को तो छोड़ दिया गया है। किन्तु व्यवस्था से पीड़ित अंतिम आदमी खासकर सामाजिक कार्यकर्ता, किसान आंदोलन से जुड़े लोगों और विभिन्न राजनीतिक पार्टियों का धरना स्थल अब मौके से नदारद है। विकास के वर्तमान सब्जबाग ने सड़क चौड़ीकरण के साथ अनशन स्थल चबूतरा खत्म कर दिया है। विडम्बना देखिए कि सत्ता और प्रशासन से भयभीत किसी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन ने इस विकास पर सवाल नहीं उठाए है।
सत्ता और विपक्ष के साथ अब आम आदमी अपनी मांगों पर कहां एकजुट होगा
अशोक लाट तिराहे के जन लोकतांत्रिक चबूतरे, अनशन स्थल के ध्वस्तीकरण के बाद आम आदमी, किसान, गरीब और मजलूमों को शासन, प्रशासन से अपनी जोर, गुहार मनवाने या बात रखने के लिए अहिंसात्मक तरीके से अब कौन सा स्थान उपलब्ध होगा सवाल यही है। जबकि हर जिले या देश की राजधानी दिल्ली से लखनऊ तक जनता के लिए धरना, अनशन, सत्याग्रह आंदोलन करने के लिए एक स्थान होता है। दिल्ली में जंतर मंतर है। लखनऊ और कानपुर से पटना तक यह स्थान है। भले ही प्रशासन से स्वीकृति लेकर उन स्थानों पर आम नागरिक अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखता था। यूपी के बांदा मे आज जो सत्ता में है क्या कल वो कभी विपक्ष में नहीं होंगे ? या जो विपक्ष है वो अपनी बात को किस स्थान विशेष में एकत्र होकर सत्ता के सामने रखेगा ? जनता के साथ विकास का यह दांव यकीनन लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता के साथ न्यायसंगत विकास नहीं है।
बांदा अशोक लाट तिराहे का शिलान्यास उसमें लगे शिलापट अनुसार गत 17 जनवरी 1948 को पंडित गोबिंद बल्लभ पंत ने किया था। जिन्हें इस पत्थर में "प्रधानमंत्री यूपी" लिखा गया है। शायद तब यूपी, उत्तराचंल की सरकारी परिभाषा में यह शब्द प्रयोग किया जाता रहा होगा। हो सकता है यह शाब्दिक त्रुटि हो लेकिन यह शिलापट इसकी पुरानी प्रासंगिकता को दर्शाता है। वहीं एक पत्थर और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का संदेश भी अंकित है। स्थानीय बड़े बुजुर्गों की मानें तो करीब 57 साल पहले तत्कालीन एसपी बांदा आग़ा मुईनुद्दीन शाह ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 111 कार्यकर्ताओं पर आंदोलन से आक्रोशित होकर गोलियां चलवा दी थी। कहते है मृतकों की लाशे तब यमुना में फिंकवा दी गई थी। बाद में उस वक्त के यूपी मुख्यमंत्री को बांदा आकर इस मामले पर हस्तक्षेप करना पड़ा था। देखना होगा कि स्थानीय जनप्रतिनिधि और संभ्रांत नागरिकों के जेहन में जनता के अनशन स्थल को लेकर कोई सार्थक पहल होती है या फिर विकास की चकाचौंध में लोकतंत्र का मतदाता सिर्फ वोटो की खेती बनकर इस मुद्दे पर कुछ हासिल नहीं कर सकेगा।