आज पुनः पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग यह चुनावी शोर है या वास्तविक संकल्प....!!?

इन्हीं मुद्दों में से एक है बुंदेलखंड को पृथक राज्य बनाने की मांग। चुनावी मौसम में इस मांग के समर्थन में बैठकें होती हैं, मार्च निकलते हैं...

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Mar 13, 2026 - 08:56
Mar 13, 2026 - 08:59
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आज पुनः पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग यह चुनावी शोर है या वास्तविक संकल्प....!!?

आशीष सागर दीक्षित...

बांदा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, वैसे-वैसे कुछ मुद्दे अचानक तेज हो जाते हैं। इन्हीं मुद्दों में से एक है बुंदेलखंड को पृथक राज्य बनाने की मांग। चुनावी मौसम में इस मांग के समर्थन में बैठकें होती हैं, मार्च निकलते हैं, ज्ञापन दिए जाते हैं और राजनीतिक बयानबाजी तेज हो जाती है। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यह आवाज धीरे-धीरे सिमट कर कहीं खो जाती है। यही कारण है कि अब आम जनमानस के बीच यह सवाल गंभीरता से उठने लगा है कि क्या बुंदेलखंड राज्य की मांग केवल एक राजनीतिक “लॉलीपॉप” बनकर रह गई है।

बुंदेलखंड लंबे समय से आर्थिक, प्राकृतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करता रहा है। मसलन नदियों,पहाड़ों का बेतरतीब उत्खनन, खेतिहर जमीनों पर स्थापित स्टोन क्रेशर से परती जमीन। यूपी, एमपी बुंदेलखंड पट्टी मे व्याप्त जलसंकट और नदी जंगल अभ्यारण्य मे जंगलों का विनाश करके जिद्दी बांध परियोजना जो आदिवासियों के विस्थापन पर टिकी है। क्या छतरपुर और पन्ना के जंगलों से बेघर होते विकास के भस्मासुर से पीड़ित आदिवासी, किसान आपके दायरे से बाहर है? क्या उनकी पीड़ा इस आंदोलन पर सरकार से जवाब मांगती है ? मसलन पन्ना टाइगर रिजर्व को बचाने के लिए लगातार होता जमीनी आंदोलन और इससे पहले बक्सवाहा के जंगल की आवाज को उठाते आदिवासियों को अलग थलग छोड़ने के किरदार आदि । विगत दो दशकों मे हुई किसान आत्महत्या पर यह पृथक बुंदेलखंड चुप्पी लिए कैसे खड़ा था सवाल तो यह भी पूछा जाएगा ? बुंदेलखंड विकास बोर्ड ने यहां की भ्रष्टाचार मे लिप्त नीतियों पर सरकार को टटोला होता तो वे ज्यादा बुनियादी ढांचों को दुरुस्त करने मे ज्यादा प्रभावी होते पर यह नहीं किया गया। यहां छोटे शहरों का अनियोजित विकास, बिगड़ी जल निकासी व्यवस्था और उनके इर्दगिर्द घूमता रहता अंतर्मुखी अकाल या सुखाड़। हमारे चंदेलकालीन जल संरचना का विलोपन , पुराने बड़े तालाबों, प्राचीन जलस्रोतों की दुर्दशा का इस पानीदार मिट्टी मे खराब पुरसाहाल। जिसने कृषि की अनिश्चितता और स्थाई रोजगार की कमी पैसा की है। खेती को घाटे का सौदा बनाया है। अनियंत्रित खनन से उपजा मौसमी व स्थाई पलायन जिसमें युवा और किसान दोनों शामिल है। लेकिन इस मसलों पर खुलकर न तो बुंदेलखंड पृथक राज्य की मांग उठाते नेतृत्व कर्ता, उनसे जुड़े लोग मुखरता से बोलते है और न ही यहां का युवा एवं बौद्धिक समाज इस पर चिंतित है।

यक़ीनन वे सत्ता और माफियाराज से व्यक्तिगत दुश्मनी को डरते है । या फिर उनके ही सफेदपोश साथी इन प्राकृतिक संसाधनों के दोहन मे सहभागी है। इस क्षेत्र की स्थायी समस्याएं जो बन चुकी है उनके समाधान को निर्वाचित माननीय तक सिर्फ शोसेबाजी (पब्लिक स्टंट) तक सीमित हैं। सत्ता उनके मुंह लग चुकी है और राजनीतिक सिद्धांत उनके अंतर्मन से विलुप्त हो चुके है। उन्होंने अपनी सात पीढ़ियों के लिए आर्थिक भौतिक विलासी सुखों के साधन का जुटान एक सूत्रीय लक्ष्य राजनीति और कुर्सी को बना लिया है। राजनीति से मिली प्रतिष्ठा , कुर्सी भी उन्हीं परिवारों तक सीमित हो गई है। वहीं इसी पृष्ठभूमि और परिदृश्य में पृथक राज्य की मांग को एक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इसके लिए अलग बुंदेलखंड राज्य के अगुआकार तर्क यह देते है कि अलग प्रशासनिक ढांचा बनने से क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाएं बन सकेंगी और विकास की गति तेज होगी। 

लेकिन इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। बुंदेलखंड की विभीषिका को दूर करने का है। पिछले एक दशक से स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में एक ही दल की पूर्ण बहुमत वाली सरकारें रही हैं और केंद्र में भी वही दल सत्तारूढ़ रहा है। यदि वास्तव में बुंदेलखंड राज्य के गठन को लेकर गंभीर राजनीतिक इच्छा होती, तो यह समय सबसे अनुकूल माना जा सकता था। किन्तु फिर भी इस दिशा में कोई ठोस पहल सदन की सामने नहीं आई। इस मसले पर वे माननीय बगले झांकने लगते है। विगत दिनों से इधर बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा बांदा ग्रामीण अंचल मे निकल रही पदयात्रा के बीच आज झांसी में भी अलग बुंदेलखंड राज्य को जुलूस की शक्ल मे पूर्व राज्य मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने समर्थकों के साथ मार्च निकाला है। उधर बांदा आसपास राजा बुंदेला अपनी लाबी के साथ गांव,गांव, पांव, पांव यात्रा निकाल रहें है। 

बड़ा सवाल यह है कि किसी भी नए राज्य गठन को एक 

संविधान की प्रक्रिया स्पष्ट है—नया राज्य बनाने के लिए संसद में विधेयक लाना होता है। वहीं संबंधित राज्यों की राज्य सरकार , उन विधानसभाओं से राय ली जाती है। किन्तु यहां ऐसा कुछ भी नहीं है।

 विडंबना यह है कि बुंदेलखंड क्षेत्र से चुने गए अधिकांश सांसद और विधायक जो भाजपा पार्टी से ही है इस मुद्दे पर सामूहिक रूप से कभी मुखर नहीं दिखते। हां कभी-कभार एक-दो जनप्रतिनिधि इस विषय को उठाते जरूर हैं। जैसे पूर्व महोबा, हमीरपुर सांसद रहे पुष्पेंद्र सिंह चंदेल। परंतु उन्होंने भी व्यापक और संगठित राजनीतिक दबाव का सियासी प्रेशर अपनी लाबी से संसद में नहीं डलवाया। इसका अभाव साफ दिखाई देता है कि आज चुने हुए जनप्रतिनिधि अलग बुंदेलखंड राज्य मामले मे मौन बैठें है। 

यही वह स्थिति है जो जनता के मन में संदेह पैदा करती रहती है। गाहेबगाहे जब यूपी मे विधानसभा चुनाव आते हैं तो यह मुद्दा राजनीतिक मंचों पर जोर-शोर से उठता है, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही मुद्दा राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची से लगभग गायब हो जाता है। उधर मध्यप्रदेश वाले बुंदेलखंड के जिलों मे यह पूरी तरह धरातल से नदारद है। जबकि सत्यता है कि बिना एमपी बुंदेलखंड के पूरा बुंदेलखंड राज्य बन ही नहीं सकता है। मध्यप्रदेश के बुंदेली इस पृथक मांग से उद्वेलित नहीं है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि यूपी वाले हिस्से में पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग कहीं न कहीं चुनावी रणनीति का एक उपकरण भर बनकर रह गई है। जिसको चुनावी लाभार्थी समयकाल के मुताबिक जिंदा किए रहते है। 

यह भी उतना ही सत्य है कि बुंदेलखंड की समस्याएं वास्तविक और गंभीर हैं। क्षेत्र के विकास के लिए विंध्याचल नदियों का पानी, माकूल सिंचाई साधन, सस्टेनेबल आजीविका और उद्योग, भ्रष्टाचार मुक्त शिक्षा नीति और स्थानीय स्तर पर रोजगार की उपलब्धता होने के साथ ,साथ इस बुंदेली क्षेत्र में ठोस और दीर्घकालिक प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने की नीतियों का राजनीतिक, सामाजिक रूप से मुकम्मल होना आवश्यक है। यदि इन समस्याओं का समाधान प्रभावी ढंग से किया जाता है तो पृथक राज्य की मांग का स्वरूप भी बदल सकता है।

आज ज्यादा आवश्यकता इस बात की है कि बुंदेलखंड के सभी जनप्रतिनिधि—चाहे वे किसी भी दल से जुड़े हों—इस मुद्दे पर स्पष्ट और सामूहिक रुख अपनाएं। बुंदेलखंड राज्य का कारवां केवल पदयात्रा की शक्ल वाले आंदोलनों और नारों से नहीं, बल्कि विधानसभाओं और संसद के भीतर ठोस पहल से ही यह तय हो सकेगा कि बुंदेलखंड का भविष्य किस दिशा में जाएगा।

अन्यथा, यदि यही स्थिति बनी रही, तो बुंदेलखंड राज्य की मांग हर चुनाव में फिर से उठेगी, कुछ समय तक सुर्खियां बटोरेगी और फिर राजनीतिक शोर में कहीं गुम हो जाएगी। तब तक बुंदेलखंड की जनता यही पूछती रहेगी—क्या पृथक बुंदेलखंड राज्य एक दूर का सपना है, या केवल चुनावी मौसम का एक परिचित नारा ?

पृथक बुंदेलखंड राज्य का शिगूफा....