बांदा : एनजीटी की जांच से पहले 'स्टंटबाजी', खान अधिकारी और सिंडिकेट ने मिट्टी डाल दफन किए अवैध खनन के सुबूत
केन नदी की जलधारा चीरकर किए जा रहे अवैध खनन के खिलाफ एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की सख्ती को ठेंगा दिखाने का बड़ा मामला सामने आया है...
अवैध पुल तोड़ा, गड्ढे भरे; भ्रष्टाचार की ढाल बनकर खड़े हुए विभागीय जिम्मेदार
बांदा। केन नदी की जलधारा चीरकर किए जा रहे अवैध खनन के खिलाफ एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की सख्ती को ठेंगा दिखाने का बड़ा मामला सामने आया है। सांडी के खंड संख्या 77 पर होने वाली जांच से पहले खान अधिकारी राज रंजन और गौरव गुप्ता की संदिग्ध भूमिका ने पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एनजीटी की टीम के आने से पहले ही खदान संचालकों ने जेसीबी और पोकलैंड मशीनों के जरिए अवैध खनन के गहरे गड्ढों को भरकर साक्ष्य मिटाने का 'स्टंट' कर डाला।
जांच से पहले ही लीक हो गई सूचना?
हैरानी की बात यह है कि खदान संचालक को 17 फरवरी को ही टीम के आने की भनक लग गई थी। सूत्रों के मुताबिक, खान विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से मिली इस गुप्त सूचना के बाद पूरे सिंडिकेट ने मिलकर रातभर मशीनें चलाईं। केन नदी की कोख में किए गए गहरे गड्ढों को ट्रैक्टरों और पोकलैंड की मदद से मिट्टी भरकर बराबर कर दिया गया, ताकि एनजीटी की टीम को अवैध खनन के प्रमाण न मिल सकें।
अवैध पुल का 'मायाजाल': एक दिन तोड़ा, दूसरे दिन फिर शुरू
एनजीटी को गुमराह करने के लिए बुधवार, 18 फरवरी को केन नदी पर बने अवैध मौरंग पुल को आनन-फानन में ढहा दिया गया। लेकिन यह कार्रवाई महज दिखावा साबित हुई।
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दिखावे की कार्रवाई: टीम के जाते ही नदी पर दोबारा अवैध पुल का निर्माण शुरू कर दिया गया है।
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पर्यावरण से खिलवाड़: जलधारा को रोककर बनाए गए इन पुलों से जलीय जीवों और नदी के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है।
पौधारोपण के नाम पर 'सफेद झूठ'
सांडी के खंड 77 पर पर्यावरण संरक्षण के दावों की भी पोल खुल गई है। 17 फरवरी को सांडी के पार्क में आनन-फानन में 27 पौधे रोपित किए गए थे।
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अवस्था: आज ये पौधे पानी के अभाव में दम तोड़ रहे हैं।
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तथ्य: एनजीटी की याचिका में दाखिल शर्तों को पूरा करने के लिए केवल कागजी खानापूर्ति की गई, हकीकत में हरियाली का कहीं नामोनिशान नहीं है।
एनजीटी के साथ 'फिक्सिंग' का खेल
सांडी खंड पर दाखिल याचिका की गंभीरता को देखते हुए टीम को मौके पर आना था, लेकिन खान अधिकारी राज रंजन और गौरव गुप्ता की कार्यशैली ने इस पूरी जांच को संदेह के घेरे में ला दिया है। आरोप है कि विभाग ने पूरी तैयारी के साथ टीम को गुमराह किया और भ्रष्ट संचालकों को अभयदान दिया।
"अवैध खनन के भ्रष्टाचार ने पूरी योजना के साथ एनजीटी की टीम की आंखों में धूल झोंकने का काम किया है। नदी का सीना छलनी करने वाले अब मिट्टी के नीचे अपने पाप छिपा रहे हैं।"
मुख्य सवाल जो जवाब मांगते हैं:
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जांच टीम के आने की गोपनीय सूचना खदान संचालकों तक किसने पहुँचाई?
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क्या एनजीटी उन गड्ढों की वैज्ञानिक जांच (जैसे मिट्टी की डेंसिटी चेक करना) कराएगी जिन्हें हाल ही में भरा गया है?
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अवैध पुल को दोबारा बनाने की हिम्मत सिंडिकेट को कहाँ से मिल रही है?