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नकली दवा

बाँदा में जेनरिक दवाओं का खेल,समाजसेवी तक हो जाते है अपनी दुकानों में फेल

" बाँदा में एलोपैथिक मेडिकल एजेंसी में रेबेलकेम डीएसआर का दस कैप्सूल वाला एक पत्ता दवा 18 रुपया का खरीद रेट है। थोक विक्रेता भी लगभग इसी कीमत में थोड़ा बहुत कमाते हुए बेंचते है। वहीं फुटकर मेडिकल स्टोर में यह दस कैप्सूल वाला एक पत्ता प्रिंटेड एमआरपी में 125 रुपया का मिलता है। इसी कीमत पर बेचा जाता है। बाँदा में फार्मा कम्पनियों की अंग्रेजी दवा में कम कमाई होने के आर्थिक क्षोभ को भांपकर मेडिकल स्टोर वाले जनता को लूट रहे है। मजेदार है इनमें बाँदा के समाजसेवी व सूचनाधिकार कार्यकर्ता के सपुत्र व सत्तारूढ़ दल में शामिल राष्ट्रवादी कार्यकर्ता, पदाधिकारी की बड़ी संख्या है। शामिल दूसरे पार्टियों से जुड़े कारोबारी भी है जो जीवन रक्षक दवाओं के पवित्र पेशे को कलंकित कर सरकार की मंशा,नीतियों व जन स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे है। अपनी तिजोरी को मोटा करने से बाज नहीं आते है। "


बुंदेलखंड के बाँदा में जेनरिक ( नकली ) दवाओं को बेचने का धंधा एक सिंडीकेट की तरह पैर पसार चुका है। ज़िला औषधि अधिकारी / ड्रग अफसर दफ्तरों में बैठकर जनता के शोषण को नजरअंदाज करते है। सिस्टम ऐसा है कि सब जानकारी में होता है लेकिन यह फुटकर दवाखाने अर्थात अंग्रेजी दवाओं के विक्रेता मेडिकल स्टोर या तो सत्तारूढ़ दल के माननीयों की खातिरदारी और रिश्ते प्रगाढ़ कर यह व्यापार कर रहे है। या फिर अधिकारी को साधकर यह हो रहा है। जानकारी के लिए बतलाते चले वर्षों से तैनात सरकारी डाक्टर, मेडिकल कालेज के डॉक्टरों तक ने जेनरिक दवाओं की कम्पनी बना रखी है। वह अपने घरों की निजी प्रैक्टिस में नर्सिंग होम में खुले मेडिकल स्टोर या परिचितों के यहां अपनी कंपनी की दवा बिक्री करा रहे है। ऐसे ही एक डॉक्टर है जिन्हें संक्षेप में डाक्टर केआर कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं है। बाँदा में न्यूज़ चैनलों, प्रिंट अखबार से जुड़े संवाददाता तक इस कारोबार से कुछ वर्षों से जुड़े है। विडंबना यह है यह नेक्सेस अब गांव कस्बों तक वायरल की तरह आबाद है। अज्ञानता में बीमारियों को ढोती जनता जेब में खुली डकैती डलवा रही है। या तो पत्रकार मेडिकल स्टोर खोले है या फिर कम्पनियों के एमआर है। हैरानी नहीं होनी चाहिए कि जिला अस्पताल में ट्रामा सेंटर पर डियूटी में तैनात इमरजेंसी डाक्टर भी बाहरी दवा इसलिए लिखतें है क्योंकि मेडिकल स्टोर की जेनरिक दवा में उन्हें कमीशन मिलता है। जनता इन डाक्टर व व्यापारियों से बखूबी वाकिफ है लेकिन सांप के बिल में हाथ कौन डाले ? सनद रहे यह गोरखधंधा बाँदा आसपास लाल मौरम कारोबार से ज्यादा मजबूत व धनार्जन वाला पेशा है जो पूरे सालभर पोषित होकर स्वस्थ रहता है। गाहे बगाहे जांच के नाम पर इसमें हल्की फुल्की कमजोरी किसी खाश मेडिकल स्टोर में आ जाये वो अपवाद की बात है। मसला सिर्फ एक जेनरिक कंपनी का नहीं ऐसी तमाम नकली दवाओं की कंपनियों का है। यह मसला जीवन रक्षक दवाओं की कालाबाजारी का भी है। छोटे ज़िले में जहां विकास के कथित कारनामों ने स्कूली शिक्षा, जागरूकता और जन जागरण को महज खबर अभियान बना रखा हो वहां इन नम्बर दो के कारोबार की सफलता पर पूरी गारंटी होती है। पब्लिक सवाल करेगी नहीं क्योंकि उसको हर कीमत में परिजनों और स्वयं का स्वास्थ्य बचाना है। प्रशासन बोलेगा नहीं क्योंकि सुविधा शुल्क बड़ा है और सरकार नियम कायदे बनाकर विश्व स्वास्थ्य संगठन को रिपोर्ट भेजने में संतुष्ट है। आखिर करोड़ों विदेशी फंड भी तो भारत मे कुपोषण, गरीबी और अंतिम व्यक्ति को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए आता है।


मुद्दा क्या है :-

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जेनरिक दवाओं का मुद्दा इस खबर के माध्यम से उठाने की जरूरत हमेशा से रही है लेकिन कुछ मर्यादा होती है कि चलो छोड़ो शायद शर्म आ जाये तो सब ठीक हो सके। अलबत्ता यह होता कभी नहीं है। कुछ कहो या लिखने की कवायद हो तो यार बैठकर भी बात हो सकती है जैसे मौकापरस्त बयान देना। फिर परिजनों पर दबाव डालना और अंततः अधिकारियों को साध लेना। मजनून ये कि सब चलने दो फिर हम भले ही समाजसेवी हो, सूचनाधिकार कार्यकर्ता हो या सत्तादल से जुड़े समर्थक, विपक्षी या बौद्धिक व्यक्ति। ' समरथ को नहीं दोष गोंसाई।' काबिलेगौर है कि ऊपर बतलाये अनुसार दस कैप्सूल वाले रेबेलकेम डीएसआर पत्ते पर एमआरपी छपा है 125 रुपया लेकिन मेडिकल एजेंसी का बिल है मात्र 18 रुपया (12% जीएसटी सहित)। वहीं इसका एक डिब्बा लेंगे तो एजेंसी का बिल रेट है 360 रुपया। यहां यह बतलाना समसामयिक है कि सामान्यतः आम नागरिक दस कैप्सूल वाला एक पत्ता ही मेडिकल से लेता है जो अमूमन वह एजेंसी जाकर नहीं लेता है। यह मानवीय स्वभाव भी है कि अपने करीबी मेडिकल स्टोर दवा खरीद ली जाए क्योंकि यह रोज खाने की वस्तु तो है नहीं चलो किसी का रोजगार चलेगा और हमारा स्वास्थ्य ठीक हो जाएगा। यह अवधारणा कपड़ा व्यवसाय पर भी लागू होती है लेकिन इतनी ठगी तो कपड़ा दुकानदार भी नहीं कर रहा है जितना कि फुटकर मेडिकल स्टोर वाले बाँदा में कर रहे है। आज बाँदा में शहर के लगभग मुहल्ले में मेडिकल एजेंसी से जुड़े व परिचित लोग रहते है। अथवा किसी न किसी एमआर / अंग्रेजी दवा मेडिकल कारोबार के जानकार अथवा व्यवसायी लोग। बावजूद इसके इस नेक्सेस पर आम आदमी की नजर नहीं पड़ती है। या फिर पड़कर नजरअंदाज कर देती है,कर रही है। आखिर क्या वजह है कि गांव से शहर तक मेडिकल स्टोर की बाढ़ है या नेटवर्क है। क्या वजह है कि एक मेडिकल स्टोर में एक ही फार्मासिस्ट का लगने वाला लाइसेंस थोक के भाव बोली लगकर कई मेडिकल दुकानें प्रयोग करती है। हालात यह है कि झोलाछाप डाक्टर भी पूरे परिवार के युवाओं, पत्नी आदि को बीफार्मा फिर एमफार्मा मध्यप्रदेश के छतरपुर आदि सुविधा जनक शैक्षणिक संस्थान से महंगी फीस देकर करा रहे है। जाहिर है वह इस खेल से पूरी तरह प्रशिक्षित है जो अगली पीढ़ी को भी अपनी भ्रस्टाचार की विधा चिकित्सा क्षेत्र में हस्तांतरण करने को बेताब है। बाँदा के कुछ एमआर तो आज दूसरे शहरों के करोड़पति कारोबारी है वह भी यहां तैनात रहे तत्कालीन सरकारी डॉक्टरों की बदौलत। यह न होता तो सरकारी डाक्टर की नौकरी छोड़कर बाँदा में ही कोई नर्सिंग होम कैसे संचालित करने लगता ? वैसे तो चिकित्सा क्षेत्र में बड़े लोचे है लेकिन आज बात जेनरिक दवा के ठगी की करना लाजमी है। बीते सप्ताह सोमवार को महाराणा प्रताप चौराहे में स्थित ओजस मेडिकल स्टोर से मैंने दस कैप्सूल का एक पत्ता रेबेलकेम- डीएसआर खुदरा एमआरपी मूल्य 125 रुपये में बड़े एहसान के साथ 110 रुपये में खरीदा। जो  अक्सर यहां या अन्य से लेता हूँ। दुःखद यह है कि तब मेडिकल एजेंसी का रेट पता नहीं था। आज जब मेडिकल एजेंसी के मित्र ने यह सच्चाई बतलाई तो दिमाग खिन्न हो गया। फिर एक परिचित मेडिकल स्टोर से कन्फर्म किया तो एक बारगी कथित समाजसेवी से अरुचि होने लगी कि सरकारी विभागों में आरटीआई डालने वाले अपने दुकान में चुप क्यों हो जाते है ? यानि हर ग्राहक से एजेंसी द्वारा 18 रुपये में ( जीएसटी सहित ) एक पत्ता दस कैप्सूल रेबिकेलेम पर छपी एमआरपी 125 रूपया वसूली जा रही है। यह सभी फुटकर मेडिकल स्टोर करते है। यहां भोग लिया तो उदाहरण दे रहे है। मुसीबत यह कि इन्हें अपने किये पर किसी प्रकार का कोफ्त नहीं है। यही काम जेनरिक कम्पनी लीफोर्ड हेल्थकेयर लिमिटेड की तमाम अंग्रेजी दवाओं की सीरीज में हो रहा है। यदि आप बुकलेट में एजेंसी के रेट और फुटकर रेट देख ले तो चेतना सुन्न हो जाएगी। उल्लेखनीय है यह बुकलेट संवाददाता के पास मौजूद है। ऐसी भरमार पड़ी है बाँदा आसपास जनपद में जेनरिक दवा कंपनियों की जिनसे एमआर व डाक्टर के साथ मेडिकल स्टोर गुलजार, सदाबहार और इज्जतदार बने बैठे है। शर्म ने दौलत की कोठियों में खुदकुशी कर ली है और जनता हलकान है। मजेदार बात यह कि इससे ड्रग अधिकारी कोई कुछ फर्क नहीं पड़ता। यह फर्क तो बाँदा में उन गरीबों,सामान्य आदमी को पड़ रहा है जिसका जीवन इन नकली दवाओं से बिगड़ता है और उसकी जेब भी पतली होती है। कारण फार्मा कम्पनियों की दवा बिक्री में कम बचत होती है। कम खाओ अच्छा खाओ कि बनिस्बत नकली बेचेंगे वाली रणनीति कामयाब है। स्वास्थ्य को पड़ता है जो दवा कारोबार से जुड़े देवता तुल्य पेशा करने वाले लोगों से लुटे जा रहे है। यही कार्य चौक बाजार से सब्जीमंडी रोड पर संचालित एक बड़ा मेडिकल स्टोर करता है। जनता शंकर के हलाहल को पीकर रोजाना अपनी जेब ढ़ीली करवाती है। क्या वजह है कि कुछ साल में मेडिकल लाइन से जुड़े कारोबारी बड़ी लक्जरी ज़िंदगी के मालिक बन जा रहे है। पत्रकार तो ऐसे फिट है इस सिस्टम में कि डाक्टर उनकी कम्पनियों का माल न खरीदे तो उन्ही का खबरी ऑपरेशन करने की हनक मिल जाती है। चार पहिया वाहनों में दवा भरकर, आगे चैनल की माइक आईडी से पूरा रुआब जलजला काट रहा होता है। जब कभी तो कमर के बख्तरबंद में लाइसेंस वाली रिवॉल्वर भी चार चांद लगा देती है। जेनरिक दवा व्यवसाय करीने से सजा बैठा है और अपनी करतूतों पर इतरा रहा है क्योंकि जानकार विभागीय अधिकारी नियंत्रण में है। बाँदा आसपास ज़िलों में औचक यूँ ही मेडिकल स्टोर फिर जानकार एजेंसी से जेनरिक दवा खरीद कीजिए प्रिय जनता आपको सच्चाई का कडुवा घूंट बेचैन कर देगा कि चिकित्सा में देवता बने बैठे लोग वास्तव में कर क्या रहे है.....!?

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