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श्रद्धांजलि

क्या आप जानते हैं कि रंगभेद जैसे अभिशाप ने ही भारत को आजाद और समृद्धि बनाया था ?

प्राचीन कालीन इतिहास के पन्ने का अध्यन करें तो मनुष्य के अनेकों क्रिया -कलापों का जखीरा आपके समाने प्रस्तुत हो जायेगा.इन्ही में से थोड़े अंश पर यदि प्रकाश डालें तो पाएंगे की मानव में विभेद आपस में सदैव बना रहा.वह चाहे काले-गोर का हो,या शासन-सत्ता का. जो मानव अपने आप को सुपीरियर समझा उसी ने अपने साथ के कमजोर और असहाय लोगों पर जुर्म ढाया.ऐसे इतिहास में आपको असंख्य उदाहरण मिलेगें. उसी कड़ी में दक्षिण अफ़्रीका की भी नस्ली भेदभाव का बहुत प्राचीन इतिहास है. बात यह है की उन दिनों एशिया में उपनिवेश कायम करने के लिए डच उपनिवेशवादियों ने कैप टाउन को अपना एक व्यापर शरणार्थी कैम्प बनाया था क्योकि डच व्यापारी इसी रास्ते का प्रयोग करते थे. उन दिनों अफ़्रीका में कुल आबादी की 70% जनसंख्या काले लोगों की थी देश की अर्थव्यवस्था पूर्णतयः उन्हीं के श्रम पर आधारित था. लेकिन यदि सारी सुविधाओं की बात करें तो मुट्ठी भर गोरे लोगों को सत्तर फीसदी सुविधा मिलती थीं और 70% ज़मीन भी उन्हीं के कब्ज़े में  सुरक्षित थी. इन्हीं आबादी के बीच रहने वाले युरोपियनों ने ख़ुद को काले अफ़्रीकियों के हुक्मरानों की तरह अपने को देखना शुरू किया. कहते है की विचार ही किसी ईमारत की नीव होती है.यही विचार ने शासकों और शासितों के बीच श्रेष्ठता और निम्नता का भेद-भाव को पनपा दिया. हालाँकि दक्षिण अफ्रीका में नेशनल पार्टी की सन् 1948 में सरकार बनी. इस पार्टी ने विधान बनाकर देश में रह-रहे काले और गोरों लोगों को अलग-अलग निवास करने की प्रणाली लागू कर दी थी. इसी दौर में ब्रिटेन ने अफ़्रीका महाद्वीप के दक्षिणी हिस्से में डच मूल के बोअर गणराज्यों के साथ महासंघ बनाने की कोशिश की क्योकि इन देशों की निगाहें अफ्रीका में मजूद सोने के खानों पर थी.हालाकी लगभग 1899 से 1902 तक अंग्रेज़ों और डचों के बीच एक दुसरे पर वर्चस्व कायम करने के लिय सघर्ष जारी रहा.जबकि इस युद्ध के दोनों पक्ष रंगभेद समर्थक युरोपियन थे. इसके उपरांत अंग्रेज़ों और डचों ने आपस में संधि कर ली और दोनों मिल-जुल कर रंगभेदी शासन को कायम रखा तथा अपने अपने देशों में कालों पर जुल्म बराबर ढाते रहे. इसी रंगभेद विचारधारा ने भारत के दो महान व्यक्ति पर भी अपना जुर्म दिया जिसका परिणाम यह हुआ की एक ने भारत को आजाद कर दिया और दुसरे ने भारत के आर्थिक समृद्धि तथा देश की जी.डी.पी. में विशेष योगदान दिया. इनमें पहले थे राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी और दुसरे मशहूर व्यवसायी जमशेद टाटा.

 

गाँधी पर हुय रंगभेद की घटना ने भारत को आजादी दिलायी 

7 जून 1893 को अफ्रीका में एक ऐसी एतिहासिक घटना घटी जो भारत को आजाद करने में अहम भूमिका साबित हुई थी. उन दिनों गांधी जी एक महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर वकालत के अभ्यास के लिए दक्षिण अफ्रीका गए हुए थे. और वे कुछ आधिकारिक काम के लिए फर्स्ट क्लास टिकट लेकर डरबन से प्रिटोरिया यात्रा कर रहे थे. जब वह फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट में बैठे थे तो एक यूरोपियन व्यक्ति ने  रंगभेदके कारण एक  रेलवे अधिकारियों को बुलाकर कहा कि ये कुली की तरह दिखने वाले आदमी को कोच से हटाओ और ट्रेन से उतार दो. जब गांधीजी ने अपना टिकट दिखाते हुए उस कोच से उतरने से मना किया तो रेलवे के लोगों ने उन्हें उनके सामान सहित पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर जबर्दस्ती उतार दिया तथा सामन फेक भी दी. जब उनका कॉन्ट्रैक्ट खत्म हुआ तो इस घटना ने उनके दिमाग में भारत की आजादी के लिए इस कदर घर करा दिया कि " उन्होंने तय कर लिया की जैसे  डिब्बे से मुझे निकाल दिया ऐसे हम अंग्रेजों को अपने देश से निकल देंगे." और गाँधी जी वापस भारत न जाने का फैसला लिया और वहीं अश्वेतों के अधिकारों के लिए आन्दोलन करना शुरू किया और आज इसी आवाज ने पूरी दुनिया को रंगभेद से मुक्ति दिलाई. इसी गाँधी जी की सोच ने  भारत को भी आजाद किया. इससे यह सिद्ध होता है की भारत की आजादी में रंग भेद का विशेष योगदान था.

जमशेद टाटा भी ब्रिटेन में रंगभेद के हुए थे शिकार   

रतन टाटा के पिता जमशेद टाटा घूमने के लिय ब्रिटेन गए हुए थे. और उन दिनों रंगभेद अपनी चरम सीमा पर था तभी की बात है की एक होटल में उन्हें इस लिए प्रवेश नहीं दिया गया की वे काले और भारतीय थे. तभी जमशेद टाटा ने यह ठाना कि वह भारत चल कर ऐसे होटलों का निर्माण करेंगे,जिन्हें हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया के लोग उसकी हसरत को देखेंगे. भारत आकर 1905 में होटल ताज-महल' का निर्माँण मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया के सामने किया. आज इस होटल को बने हुए लगभग 116 साल हो गया है.जो वाकई में उनकी सोंच का यह होटल भारत के सामर्थ्य का बखान भी कर रहा है. आज भी यह होटल उन सभी का स्वागत करता है चाहे किसी भी देश और वर्ग का क्यों न हो. खासकर उनका भी जिन्होंने जमशेद  टाटा को इस तरह दिमागी रूप से परेशान किया था जिसके चलते वे ऐसा शानदार होटल बनाने का निर्णय लिया था. दूसरी तरफ देश में तमाम फैक्ट्री डालकर नमक से लेकर ट्रक तक बनाते गये जिससे देश की अर्थ व्यवस्था में अमूल -चुल परिवर्तन हुआ.जमशेदजी टाटा ने इतना व्यवसाय फैलाया की भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति तथा औद्योगिक घराने को टाटा समूह के नाम से पूरी दुनिया जानती है. जमशेद जी ने भारत में औद्योगिक विकास नींव रखी यानि उसके जनक थे.

आज की इस लेख के विषय का मूल्यांकन करते हुए हम कह सकते हैं की रंगभेद ने भारत की अर्थ व्यवस्था और आजादी में विशेष योगदान दिया. आज के दिन  की महत्त्व को हम इस लिये बयाँ कर रहें है कि राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की मृत्यु न हुई होती यदि आज ही के दिन 19 मई 1910 को नाथूराम गोडसे पैदा   न हुआ होता. तथा दूसरी तरफ भारत के प्रसिद्ध उद्दोगपति स्वर्गीय जमशेद जी टाटा की मृत्यु आज ही के दिन 19 मई 1904 में हुई थी इस लिए मैंने इन दोनो महान व्यक्तियों की यादगार में कुछ तथ्यों का चित्रण करने का विचार करके मिला–जुला लेख लिखा. अब हम जमशेद जी टाटा और राष्ट्र पिता मोहनचंद्र करमचंद्र गाँधी जी को इस त्याग बलिदान पर हम हृदय से सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

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