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स्थापना दिवस

क्या आप जानते हैं की जोधपुर शहर की स्थापना में, अन्धविश्वास के तहत राजिया भाम्बी के बलि का विशेष योगदान रहा है.

“जोधपुर शहर की स्थापना में अनेकों इतिहासकार पत्र, पत्रिकाओं चैनलों आदि में जो भी विवरण मिलता है वह अधिकांशतः मारवाड़ के राजा राव जोधा को प्रमुखता से श्रेय दिया गया है. जबकि डॉ.एम.एल.परिहार द्वारा लिखी पुस्तक “अमर शहीद राजाराम मेघवाल का इतिहास” में वर्णित तथ्य के अनुसार “शहीद राजाराम मेघवाल’“ का बलिदान अतुल्यनीय है.और इस बात का दावा किया जा सकता है की यदि बलि न हुआ होता, तो हो सकता था की जोधपुर शहर बसता ही नहीं और न आज उसका ऐसा स्वरुप होता. तो हम कह सकते है कि राव जोधा का, स्थापना में वह योगदान नही था जो राजाराम मेधवाल उर्फ़ राजिया का था.आप लोगो को भलीभांति मालूम है की आप सब कुछ दे सकते हैं परन्तु जान नहीं, यदि जान के बदले में दुनिया की वेसकिमती चीज भी मिले तो भी नहीं.”

मारवाड़, राजस्थान प्रदेश के पश्चिम में थार के मरुस्थल (भारत और पाकिस्तान का भाग) मारवाड़ संस्कृत के मरूवाट शब्द से बना है जिसका अर्थ है, मौत का भू-भाग. ईशा पूर्व यानि प्राचीन काल में इस भूभाग को मरूदेश भी कहते थे. इसके अंतर्गत राजस्थान के बाड़मेर, जोधपुर, पाली, जालोर और नागौर के जिले आते है थे. कहानी यह है की राव जोधा के पिता राव रणमल के मौत के बाद राव जोधा को मारवाड़ से अलग होना पड़ा. इसके पहले राणा रणमल का मारवाड़ प्रान्त पर शासन था जिनके आदेश से ही वहा का राज्य चलता था. वहा के स्थानीय कुछ सरदार इनसे जलते थे जिसके कारण राणा रणमल का शासन उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था.इसके बाद मेवाड़ के तत्कालीन राजा कुम्भा और उनकी माता सौभाग्य देवी को सरदारों ने शिकायत करके भड़काया और साजिश के तहत गहरी नीद में सोये हुए राणा रणमल की हत्या करवा दी . राणा रणमल की हत्या के उपरांत उनके बेटे वारिस राव जोधा को अपने राज्य से विमुक्त होना पड़ा. कुछ दिन बाद राव जोधा ने एक पहाड़ी पर अपना एक दुर्ग बनाने के बारे में सोचा और इस दुर्ग को 1459 ईस्वी में बनाना शुरू किया. जब राजा राव जोधा दुर्ग निर्माण के लिए इस पहाड़ी पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक बकरी जंगल के खूंखार जानवर   बाघ से लड़ते रही थी. उन दिनों इस पहाड़ी पर शेरो की काफी गुफाये थी. जब राव  यह घटना अपनी आखो के सामने देखा तो यहीं दुर्ग बनाने का निर्णय ले लिया.

स्थापना का संक्षिप्त इतिहास

“जोधपुर शहर की स्थापना में अनेकों इतिहासकार पत्र, पत्रिकाओं चैनलों आदि में जो भी विवरण मिलता है वह अधिकांशतः मारवाड़ के राजा राव जोधा को प्रमुखता से श्रेय दिया गया है. जबकि डॉ.एम.एल.परिहार द्वारा लिखी पुस्तक “अमर शहीद राजाराम मेघवाल का इतिहास” में वर्णित तथ्य के अनुसार “शहीद राजाराम मेघवाल’“ का बलिदान अतुल्यनीय है.और इस बात का दावा किया जा सकता है की यदि बलि न हुआ होता, तो हो सकता था की जोधपुर शहर बसता ही नहीं और न आज उसका ऐसा स्वरुप होता. तो हम कह सकते है कि राव जोधा का, स्थापना में वह योगदान नही था जो राजाराम मेधवाल उर्फ़ राजिया का था.आप लोगो को भलीभांति मालूम है की आप सब कुछ दे सकते हैं परन्तु जान नहीं, यदि जान के बदले में दुनिया की वेसकिमती चीज भी मिले तो भी नहीं.”

आइए डॉ.एम.एल.परिहार द्वारा लिखी पुस्तक “अमर शहीद राजाराम मेघवाल का इतिहास” में वर्णित तथ्य के अनुसार “शहीद राजाराम मेघवाल’“ का बलिदान की शौर्य गाथा की एक चित्रण पे प्रकाश डालते है --- 

कहानी की शुरुवात

भारत के राजस्थान में स्थित मेहरानगढ़ दुर्ग की अजीबोगरीब कहानी इतिहास के पन्ने से बोल रहीं है.12 मई 1459 में जब इस दुर्ग की नीव रखी जा रही थी तब एक व्यक्ति राजाराम मेघवाल ने खुद अपने को उस नींव के साथ चुनवाया. 12 मई 2021 को जोधपुर शहर की स्थापना हुए 562 वर्ष लगभग पूरा होने जा रहा है.इसी स्थापना दिवस के मद्देनजर मेहरानगढ़ दुर्ग की कहानी यह है की मारवाड़ की राजधानी उन दिनों मंडोर हुआ करती थी.इन दिनों मारवाड़ पर राठौड़ वंश राज्य था जिसके तत्कालीन शासक राव जोधा ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक नया शहर बसाने की कल्पना की.तदुपरांत इसके लिए वर्तमान जोधपुर शहर के स्थान का चयन कर चिड़ियानाथ टूंक नाम की पहाड़ी की चोटी पर एक नया दुर्ग बनाने का निर्णय लिया.

पंडितों-तांत्रिकों ने बताया स्थापना में नरबलि जरूरी

पुस्तक का लेखक यह लिख रहा है की राव जोधा ने नए दुर्ग का निर्माण शुरू करने से पूर्व पंडितों और तांत्रिकों से परामर्श चाहा ताकि वंश में आगे किसी प्रकार का विघ्न न उत्पन्न हो. उन दिनों अंधविश्वास इतनी चरम सीमा पर थी की “जनों न सिर्फ मानों” की सिद्धांत के ज्यादा मानने वाले थे. पंडितों-तांत्रिकों की राय थी कि किसी भी बड़े कार्य की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि किसी नर की बलि दी जाए. उन लोगों ने राजा को कहा राजन यदि किले की नींव में किसी जीवित व्यक्ति को पत्थरों के साथ चुनवा दिया जाए तो राठौड़ राजवंश को कभी पराभव के दिन नहीं देखने होगे. इस राय से सहमत होकर राव जोधा ने मारवाड़ के पुरे इलाके में मुनादी करवा दी.अब राजा के हरकारे गांव-गांव जाकर ढोल-नगाड़ों को बजा-बजा कर जनता को राजा का फरमान सुनाया .

 

राजा का फरमान

राजा की आज्ञा के अनुरूप हरकारों ने पुरे रियासत में गांव-गांव जाकर घोषणा की कि राव जोधा मारवाड़ की नई राजधानी का निर्माण करने जा रहे है. इसके लिए किसी ऐसे राजभक्त,वीर पुरुष की आवश्यकता है जो दुर्ग की नींव में स्वयं को जीवित गाड़े जाने के लिए अपनी मर्जी से आपना जान राज्य के लिय बलि कर दे. ऐसे में उस व्यक्ति को ढेरों पुरस्कार के साथ उनके परिजनों और वंशजों को जोधपुर में रहने व का खेतीबाड़ी के लिए पर्याप्त मात्रा में जमीन दी जाएगी. ऐसा वीर पुरुष 12 मई को सुबह चिड़ियानाथ की टूंक की पहाड़ी पर अपने आप को बलि के लिय पहुंचें. राव जोधा ने तो मुनादी करवा दी, लेकिन जीते जी स्वयं कौन बलि करवाएगा. यह बड़ा प्रश्न था. कई दिन निकल गए लेकिन बलि के लिय  कोई तैयार न था. आखिरकार राजा बड़ा निराश हुआ क्योंकि इंतजार करते–करते तय समय से मुहूर्त का दिन 12 मई आ गया. चिडिय़ानाथ की टूंक पहाड़ी पर नींव के मुहूर्त की तैयारियां समय के अनुरूप शुरू हो गई पर कोई बलि देने वाला  दिखाई नहीं पड़ रहा था. अब राजा के साथ  पंडित व जागीरदार सहित और लोग बड़ी संख्या में पूजा की तैयारियों में जुट गए. सभी को बलिदानी का इंतजार था.

आगे आया राजिया

निराशा में डूबे राव जोधा ने घोषणा कर दी कि मुहूर्त का तय सीमा समय निकलना नहीं चाहिए. इसलिए नींव भरने का कार्य शुरू किया जाए. जैसे ही नींव भरने का कार्य शुरू होता की उससे पूर्व शांत वातावरण में एक आवाज गूंजी- ठहरो  सभी उस आवाज की तरफ देखने लगे. एक व्यक्ति आगे आया और बोला मैं नींव में स्वयं को चुनवाने के लिय तैयार हूं. इस पर राव जोधा ने उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम राजिया भाम्बी बताया . राव जोधा ने एक बार फिर उससे पूछा और उसने जोर देकर सहमति जताते हुए कहा कि इस कार्य के लिए राजन जो भी सुविधा देने के लिए कहा गया है वह  अभी दी जाए. इस पर उसे जमीन का पट्टा व दस हजार रुपए नगद प्रदान किए गए. राव जोधा के आदेश पर जमीन का पट्टा उसकी पत्नी व पुत्र के नाम तुरंत कर दिया गया.

...और जा खड़ा हुआ नींव में

अगले ही पल राजाराम उर्फ़ राजिया भाम्बी कूद कर नींव भरने के स्थान पर पहुंच गया. और मुहूर्त देख पंडितों ने मंत्र पढ़ना शुरू किए साथ- साथ कारीगरों ने राजाराम के चारों तरफ पत्थरों की चुनाई शुरू की. राजिया वहाँ मूकदर्शक बना सभी को निहारता रहा. देखते ही देखते राजिया को पत्थरों के बीच चुन नींव का एक हिस्सा तैयार हो गया. इसके बाद में राजाराम के चुने जाने के स्थान के ठीक ऊपर पंडितों की सलाह से दुर्ग का खजाना भी  बनाया गया. जो आज भी  राजिया के तन पर खड़ा यह दुर्ग साढ़े पांच सौ बरस से कितने ही झंझावतों का साक्षी बन खड़ा अपनी इतिहास का गवाह बना हुआ है. यह दीगर बात है कि जिस राठौड़ वंश के राज्य के लिए राजिया ने अपनी आप को बलि दिया वह अब अक्षुण्ण नहीं रह पाया क्योंकि इसे आत्मबलिदान कहें या विक्षिप्त होने की अवस्था आज भी प्रश्न बना हुआ है.हलाकि देश की आजादी के बाद लोकतंत्र में अब राजशाही नहीं रही, लेकिन राव जोधा का बनवाया यह दुर्ग आज भी राजिया भाम्बी के तन पर खड़ा है.

 

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